वन विभाग को ‘वन्यजीव प्रेमी, एनजीओ, और पत्रकारों’ से परहेज क्यों?

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✍️यश कायरकर, (जिल्हा प्रतिनिधी)

आए दिन जंगलों से सटे गांव, जंगल, और आसपास के परिसरों में मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ती जा रही है। साथ ही जंगलों में या जंगलों के बाहर बस्तियों के आसपास खेतों में बड़े पैमाने पर मनुष्य हानि के साथ साथ वन्य प्राणियों की भी जिवहानि हो रही है। जिसमें बाघ, तेंदुए, भालू, हिरण जैसे जंगली जानवर, कुछ आपसी संघर्ष में, कुछ खेतों की फसल की रखवाली करते वक्त गलती से, या कुछ वन्य प्राणियों के अंगों की मांस की अवैध तस्करी करने के लिए जान बूझकर मारे जा रहे हैं।
ऐसे में वन विभाग मनुष्य बल की कमी के चलते, जनसंपर्क कम होने की वजह से, इन घटनाओं पर अंकुश लगाने में नाकाम साबित हो रहा है। या फिर सामान्य नागरिकों में वन विभाग के प्रति आक्रोश होने की वजह से, वन विभाग और लोग इनमें समन्वय नहीं हो पा रहा है। और इन दोनों के बीच कि डोर जोड़कर लोगों और वन विभाग में समन्वय रखने का कार्य, या फिर जंगलों से हो रही अवैध तस्करी, ग़लत धारणाओं के बारे में जनजागृति, या फिर वन विभाग को हमेशा तस्करी के बारे में सूचित कर 90% जंगल और वन्यजीवों को बचाने का काम बिना किसी लालच के वन्य जीव प्रेमी संस्थाएं ही करती है। जो किसी भी मुआवजे के बिना ऐसे कार्य करती है।
(बेकाबू हालतों में ही मौके पर बुलाया जाता है)
और जब भी कहीं किसी जंगली जानवर द्वारा मनुष्य हनी हो जाती है। तब विपरीत परिस्थितियों में हमेशा वन विभाग को सहयोग करने, परिस्थिति नियंत्रित करने, संभालने के लिए हमेशा ही वहां की वन्य जीव संस्थाएं, (NGO) या वन्य जीव प्रेमी आगे आते हैं, या बुलाया जाता है। जिससे उस विपरीत हालातों में वन विभाग परिस्थिति संभाल पाता है।
(कभी जान बूझकर मौके से दुर रखा जाता है)
पर जब भी कभी जंगल में या जंगल के बाहर खेतों में या कहीं आसपास कोई वन्य जीव बाघ, भालू, तेंदुआ, हिरन, सांभर जैसा कोई जंगली जानवर मारा जाता है, या मर जाता है। ऐसी घटना में अगर कोई वन्यजीव प्रेमी मौके पर आकर स्थिति का जायजा लेना चाहे, या फिर वनविभाग के साथ रहना चाहे। तो उनकी उपस्थिति नकारा जाता है। जब की किसी भी शेड्यूल वन के वन्यजीव की मौत होती है तब मौके पर पारदर्शक पंचनामा करने के लिए इनकी उपस्थिति अनिवार्य है। फिर भी इन्हें वहां आने की परवानगी नहीं दी जाती है। वन्यजीव प्रेमियों को, या NGO को आपसी खुन्नस की वजह से कुछ वन कर्मियों द्वारा गलत बर्ताव कर दुत्कार दिया जाता है। जिस वजह से वन्यजीव प्रेमी वन विभाग से भी दूर हो रहे हैं। वन्यजीव प्रेमियों को इस तरह से दूर रखना गलत है, और वन विभाग के प्रति कुछ सवाल पैदा करता है।
पर जो भी हो आज की परिस्थिति में मानव वन्यजीव संघर्ष, वन विभाग और लोगों में बढ़ता हुआ संघर्ष है, अतिक्रमण, अवैध लकड़ी तस्करी, अवैध शिकार, इन सभी को रोकने के लिए वन विभाग को या फिर उनके अधिकारियों को भविष्य की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ‘पर्यावरण – मानव और वन विभाग’ तीनों की सहायता करने के लिए हमेशा तैयार रहने वाले वन्यजीव प्रेमियों को साथ लेकर चलना ही पर्यावरण और जंगलों के भविष्य के लिए हितकर साबित होगा।
स्थानीक और परिसर के एन.जी.ओ. को साथ लेकर वन विभाग ने हमेशा चलना चाहिए जिससे जंगलों और वन्यजीवों की नुकसान पर काबू पाया जा सके’ – विवेक करंबेकर, मानद वन्यजीव संरक्षक, ब्रह्मपुरी वन विभाग।

एक तरफ प्रशासन पारदर्शिता चाहता है, मात्र वन्यजीव प्रेमियों के सहकार्य करने से ही 90% वन और वन्य प्राणियों की तस्करी पकडी जाती हैं। फिर भी वनविभाग द्वारा वन्यजीव प्रेमियों को बाघों या अन्य जानवरों के मरने पर घटनास्थल पर आने से रोकने पर सवाल खड़े हो जाते हैं। कुछ अफसरों का ऐसे ग़ैर बर्ताव एकदम ग़लत हैं। – अमोद गौरकर, अध्यक्ष तरुण पर्यावरण मित्र मंडल।

जब भी कोई घटना होती है, तो हमारा विभाग वन्यजीव प्रेमियों बुलाता है। इसमें वनविभाग को ही सहयोग होता है। और सभी अफसरों को ये बात करनी जरूरी है। कोई असहयोग करता है तो मुझसे संपर्क करे। – दिपेश मल्होत्रा, उप वन संरक्षक ब्रह्मपुरी.
✍️ यश कायरकर,
(9881823083)

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