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लोहार डोंगरी खनन परियोजना: एक मायाजाल, लाखों लोगों की जान और जंगल खतरे में

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वन विभाग, अभ्यास समिति और ग्रामीणों के विरोध के बावजूद शासन की मंजूरी पर सवाल

जिला प्रतिनिधी : यश कायरकर

महाराष्ट्र के चंद्रपुर ज़िले में स्थित लोहार डोंगरी लौह अयस्क खनन परियोजना को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। वन विभाग, राज्य वन्यजीव बोर्ड (SBWL) की अभ्यास समिति और स्थानीय ग्रामीणों के स्पष्ट विरोध के बावजूद इस परियोजना को मंजूरी दिए जाने से पर्यावरण, वन्यजीव और मानव जीवन पर बड़े खतरे की आशंका जताई जा रही है।

अभ्यास समिति की आपत्तिजनक रिपोर्ट

राज्य वन्यजीव बोर्ड के निर्देशानुसार गठित अभ्यास समिति —

मुख्य वन संरक्षक, चंद्रपुर (अध्यक्ष)

प्रवीण सिंह परदेशी (सदस्य, SBWL)

श्रीमती पूनम धनवते (सदस्य, SBWL) ने 28 अक्टूबर 2023 और 18 नवंबर 2023 को प्रस्तावित खदान क्षेत्र का संयुक्त निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान डिप्टी वन संरक्षक, ब्रह्मपुरी एवं एसीएफ (तेंदू), ब्रह्मपुरी भी उपस्थित थे। परियोजना प्रस्तावक सनफ्लैग आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड की ओर से प्रतिनिधि श्री गणेश मानेकर भी मौजूद थे।

समिति की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि परियोजना के लिए 35.94 हेक्टेयर जैव विविधता से समृद्ध आरक्षित वन क्षेत्र की मांग की गई है, जिसमें 18,024 पुराने और बड़े वृक्ष मौजूद हैं। यह क्षेत्र बाघ, तेंदुआ और अन्य प्रमुख वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास है।

महत्वपूर्ण बाघ गलियारे में प्रस्तावित खदान

प्रस्तावित लोहार डोंगरी खदान ब्रह्मपुरी वन प्रभाग के घने जंगलों के मध्य, घोडाझारी वन्यजीव अभयारण्य के निकट स्थित है। यह क्षेत्र एक अत्यंत महत्वपूर्ण बाघ गलियारा है, जो ताडोबा-अंधारी टाइगर रिज़र्व की बाघ आबादी को ब्रह्मपुरी–गडचिरोली परिदृश्य और उत्तरी बाघ-प्रधान वनों से जोड़ता है।

अभ्यास समिति के अनुसार, खनन, सड़क निर्माण और भारी परिवहन जैसी गतिविधियां इस पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर व्यापक और दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव डालेंगी।

मानव-वन्यजीव संघर्ष चरम पर

यह जंगल क्षेत्र 60 से अधिक बाघों, लगभग 100 तेंदुओं, 20–30 भालुओं, लकड़बग्घों, भेड़ियों, सियारों, जंगली कुत्तों, जंगली बिल्लियों, हिरणों, खरगोशों, बंदरों, बिज्जुओं और सैकड़ों पक्षी प्रजातियों का घर है।

खनन के कारण बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और आवास विखंडन होगा, जिससे वन्यजीव मानव बस्तियों और खेतों की ओर रुख करेंगे। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष में तेज़ वृद्धि, जान-माल की हानि और राज्य पर मुआवजे का भारी आर्थिक बोझ पड़ने की आशंका जताई गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह क्षेत्र पहले से ही मानव-वन्यजीव संघर्ष की उच्चतम सीमा पर पहुंच चुका है।

जल, वायु प्रदूषण और कृषि पर संकट

लोहार डोंगरी क्षेत्र के चारों ओर स्थित किटाडी, गंगासागर हेटी और आलेवाही जैसे बड़े तालाब खनन से होने वाले प्रदूषण की चपेट में आ सकते हैं। इन जल स्रोतों पर निर्भर हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि, पशुधन, वन्यजीव और स्थानीय आबादी के लिए यह गंभीर खतरा होगा।

विस्फोटों, धूल, जल प्रदूषण और भारी वाहनों के कारण स्वास्थ्य, कृषि, जल उपलब्धता और आजीविका पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका जताई गई है।

रोजगार के नाम पर जंगलों का विनाश?

प्रस्तावित ओपन कास्ट खदान आरक्षित वन क्षेत्र क्रमांक 95 में स्थित है। यहां कई औषधीय पौधे, फलदार वृक्ष, जलस्रोत, नाले और झीलें मौजूद हैं। उल्लेखनीय है कि अंग्रेज़ों ने भी पर्यावरणीय नुकसान को देखते हुए इस क्षेत्र में खनन से परहेज़ किया था, जबकि रेल लाइन बिछाई गई थी।

परियोजना से स्थानीय स्तर पर केवल 120 लोगों को रोजगार, जिनमें से मात्र 32 स्थायी होंगे।

खुदाई की गहराई: 54 मीटर

परियोजना अवधि: 12 वर्ष

वार्षिक उत्पादन: 1.1 मिलियन टन

वास्तविक अयस्क उपलब्धता: 1.1 लाख टन प्रतिवर्ष

खनन क्षेत्र के 35.73 हेक्टेयर के प्रभाव क्षेत्र (Impact Zone) का कोई समुचित अध्ययन नहीं किया गया है। अयस्क परिवहन के लिए 600 मीटर लंबी और 6 मीटर चौड़ी सड़क के लिए अतिरिक्त वन भूमि की कटाई प्रस्तावित है।

ग्रामीणों में आक्रोश, जन आंदोलन की चेतावनी

स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि कृषि, स्वास्थ्य, पर्यावरण, जल स्रोत और वन्यजीवों को होने वाला नुकसान, खनन से मिलने वाले सीमित आर्थिक लाभों की तुलना में कहीं अधिक है।

ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि यह परियोजना लागू करने की कोशिश की गई तो आसपास के सभी गांव मिलकर जन आंदोलन छेड़ेंगे और हर स्तर पर इसका विरोध किया जाएगा।

 

 

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