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फिर से ताडोबा में 2 बाघों की आपसी लड़ाई में मौत

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(जिले में 1 हप्ते में 4 बाघों की मौत, तो ढाई महीने में जिले में 11 बाघों की मौत* बढता ही जा रहा है आकडा)

यश कायरकर (जिल्हा प्रतिनिधी): चंद्रपुर जिले के ताडोबा के सेल नंबर 338 पाणघाट कुटी परिसर में खातोडा तलाब क्षेत्र पाणघाट कुटी में कल  2 बाघ मृत्त अवस्था में पाए जाने से वनविभाग में हड़कंप मचा हुआ है। दोनों बाघों के शवों को देखते हुए अधिवास की लड़ाई में आपसी संघर्ष में उनकी मौत होने की आशंका जताई जा रही है दोनों बाघों के शरीर के अवयव सुरक्षित है। वनविभाग का अनुमान है कि 20 से 21 जनवरी के बीच लड़ाई में इन बाघों की आपसी संघर्ष में मौत हुई होगी। इनमे एक नर बाघ T142 आयु 6 से 7 साल है और दुसरा बाघ T 92 मादा बाघीन का शावक आयु 2 साल का  है।  पशु चिकित्सा अधिकारी रविकांत खोबरागड़े द्वारा शवविच्छेदन करने के बाद बाघों का अंतिम संस्कार कर दिया गया और उनके मौत का सही वजह जानने के लिए विसरा प्रयोग शाला में भेजा गया। इस अवसर पर ताडोबा कोअर क्षेत्र के उपनिर्देशक नंदकिशोर काळे, वनपरिक्षेत्र अधिकारी (वन्यजीव) कोळसा रुंदन कातकर, बंडू धोतरे NTCA प्रतिनिधि, WPSI प्रतिनिधि मुकेश भांदक्कर , WII रिसर्चर क्रीष्णन, बायोलॉजिस्ट यशस्वी राव आदि  मौजूद थे।

नये साल की सुरूवात के साथ ही भारत में बाघ मरने की घटनाओं की शुरुआत भी चंद्रपुर जिले से ही हुई। और 2023 के अंतिम महीने में बाघ करने की घटनाएं चंद्रपुर जिले में ही हुई थी यह सिलसिला अब रुकने का नाम नहीं ले रहा है।
जिले में नए साल की शुरुआत में और भारत देश में प्रथम अपने ही जिले से बाघों की मौतों के सिलसिले की शुरुआत होकर 1 हप्ते में 4 बाघों की मौत होने से वन विभाग में हड़कंप मचा है और वन्यप्रेमियों में मायूसी है। इसके पहले भी 20 जनवरी को भद्रावती तहसील के चालबर्ड़ी में एक खेत के कुएं में एक बाघ मृत अवस्था में पाया गया था। 15 जनवरी को 2 बाघों के संघर्ष में एक बाघ की ताड़ोबा अंधारी बाघ परियोजना के बफर क्षेत्र में बोर्डा सर्वे क्रमांक 250-1 में एक खेत में गश्त के दौरान बाघ का मृत अवस्था में शव मिला था।
जिले में 1 हप्ते में 4 बाघों की मौत, तो ढाई महीने में जिले में 11 बाघों की मौतें , मौतों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है, क्या यह सिलसिला साल भर जारी रहेगा?
पिछले ढाई महीने में चंद्रपुर जिले में कुल 11 बाघों की मौत हुई है. चिमूर वनपरिक्षेत्र में 14 नवम्बर को 2
बाघों के संघर्ष में 1 बाघ की मृत्यु हुई थी, 18 नवम्बर को ताड़ोबा में प्राकृतिक रूप से बाघ की मौत हो गई. 10 दिसम्बर को वरोरा वनपरिक्षेत्र में हादसे में बाघ की मौत, 14 दिसम्बर को पलसगांव में प्राकृतिक रूप से बाघ की मौत, 21 दिसम्बर को बिजली का करंट लगने से सिंदेवाही परिक्षेत्र में बाघ की मौत हुई थी. 24 दिसम्बर को शिकार की तलाश में कुएं मे गिरने से तलोधी बा. वनपरिक्षेत्र में बाघ की मौत हुई थी. तो सोमवार 25 दिसम्बर को सावली वनपरिक्षेत्र में सड़ी गली हालात में मादा बाघिन का शव पाया गया, नये साल में फिर से जिले में 15 जनवरी को ताड़ोबा अंधारी बाघ परियोजना के बफर क्षेत्र में बोर्डा सर्वे क्रमांक 250-1 में एक खेत में गश्त के दौरान बाघ का मृत अवस्था में शव पाया गया. दो बाघों के बीच हुए संघर्ष में बाघ की मौत होने की आशंका जताई गयी थी. उस बाघ की शिनाख्त टी -51 के तौर पर की गई और 20 जनवरी को भद्रावती तहसील के चालबर्डी के खेत परिसर  में एक बाघ कुएं में मर हुआ मिला था। और कल 22 जनवरी को ताडोबा के सेल नंबर 338 में खटोबा झील क्षेत्र में कल  2 बाघ मृत्त अवस्था में पाए गए। पिछले ढाई महीने से लगातार जिले में 11 बाघों के मौतों से सिलसिला यूं ही चलता जा रहा है ,और मौतों का आंकड़ा बढ़ रहा है और बाघों की गिनती कम होती जा रही है।
  क्या है वजह इसके पीछे? सोचना और अब गंभीरता से लेना जरूरी।
सही वजह जानने की कोशिश करो तो.. हमारे चंद्रपुर जिले के  ताडोबा अंधारी व्याघ्र प्रकल्प या इसके आसपास के जंगलों में बाघों की बढ़ती हुई संख्या मुख्य कारण है। पर साथ ही जंगलों के चारों ओर बाहरी क्षेत्र में बढ़ता हुआ अतिक्रमण, जंगलों से गुजरती हुई और चौड़ी होती हुई सडके , रेल मार्ग, या फिर पानी की नहरे, और जंगलों के अंदर अतिरिक्त पैसा कमाने की चाह में क्षमता से अधिक पर्यटन, अवैध शिकार, अवैध उत्खनन और जंगलों के अंदर इंसानी हस्तक्षेप जिसके तहत बाघों को अपना अधिवास छोड़कर जंगल के बाहर आना पड़ रहा है। जिस वजह से जंगलों के बाहर खेतों की रक्षा में लगाए गए करंट में कई बाघ मारे जा रहे हैं, या फिर खेतों के कुएं में गिरकर बाघ मार रहे हैं। या फिर अधिवास के लिए भटकते हुए रास्ते पर दुर्घटनाओं में या आपसी संघर्ष में बाघों के मरने का आंकड़ा भी बढ़ता ही जा रहा है। किसी भी हालत में अब बाघों की बढ़ती हुई संख्या के साथ-साथ उन्हें बचाने की चुनौतियां भी बहुत बढ़ गई है।  जिसके मध्य नजर रखते हुए गंभीरता से ध्यान देते हुए निगरानी भी जरूरी हो गई है। और बाघों की इन मौतों को रोकने में कुछ कामयाबी हासिल हो जाएगी वरना यह बाघों की मौतों का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। और फिर हम लोगों को कहना पड़ेगा ‘एक टाइगर था!’

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