
पुणे : प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक और प्रकृति-प्रेमी डॉ. हेमा साने का 85 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पुणे के बुधवार पेठ स्थित एक पुराने घर में वे रह रही थीं। उनके निधन से शैक्षणिक और पर्यावरणीय जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
1960 से बिजली और उपकरणों से दूरी
डॉ. हेमा साने का जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण और प्रकृति-केन्द्रित रहा। 1960 से उन्होंने कभी बिजली का उपयोग नहीं किया। न उन्होंने बिजली के बल्ब जलाए, न टीवी, न फ्रिज और न ही किसी विद्युत उपकरण का सहारा लिया। वे केवल प्राकृतिक रोशनी और पर्यावरणीय संतुलन पर आधारित जीवन जीती रहीं।
शिक्षा और कार्य
उन्होंने वनस्पति शास्त्र (Botany) में एम.एससी. और पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी। इसके अलावा, भारतविद्या शास्त्र में एम.ए. और एम.फिल. भी किया था। पुणे के आबासाहेब गरवारे कॉलेज में वे वनस्पति शास्त्र विभाग की प्रमुख के रूप में कार्यरत रहीं। उनके अध्यापन से अनेक विद्यार्थियों ने प्रेरणा पाई और पर्यावरणीय चेतना का संदेश ग्रहण किया।
प्रकृति के प्रति लगाव
डॉ. साने का घर हरियाली और पक्षियों की चहचहाहट से घिरा रहता था। वे पेड़-पौधों और पक्षियों को अपना परिवार मानती थीं।
लेखन कार्य
उन्होंने पर्यावरण और वनस्पति शास्त्र पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं, जिनमें प्रमुख हैं:
दिवसाच्या सूर्यप्रकाशात, आपले हिरवे मित्र, बुद्ध परंपरा आणि बोधीवृक्ष, पुणे परिसरातील दुर्मिळ वृक्ष, समाज में शोक.
उनके निधन की खबर फैलते ही समाज के विभिन्न वर्गों में हळहळ व्यक्त की जा रही है। उन्हें न केवल एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक के रूप में, बल्कि प्रकृति के सच्चे साधक के रूप में भी हमेशा याद किया जाएगा।


