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हाथभट्टी शराब के लिए हो रहा बड़ी मात्रा में सागौन का इस्तेमाल

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चंद्रपूर : मोहर्ली बफर वनक्षेत्र में पिछले कई वर्षों से हाथभट्टी से मोहफूल की शराब निकाली जा रही है।  इस क्षेत्र की दुर्गापुर पुलिस ने भी काफी बार हाथभट्टी लगाने वालों के खिलाफ कारवाई की गई है।

दुर्गापुर पुलिस का कहना है कि चूंकि यह वनक्षेत्र में है, जो उनकी सीमा से बाहर है, इसलिए इसे वन विभाग की मदद से किया जाना चाहिए, क्योंकि यह क्षेत्र बाघों का घर है, या फिर वन विभाग को ओर से कारवाई होनी चाहिए।
यह सब सत्य है, लेकिन जंगल में जो मोहफूलों से शराब निकालने के लिए हाथभट्टी चलाने जो इंधन लगता है उसके लिए जंगल से अवैध कटाई जोरोसे चल रही है जिसमे साग और बिजा के पेड़ बडे पैमाने मे काटे जा रहे है।

हालही मे वनविभाग के STPF ने सुत्रो से मिली जाणकारी के आधार पर मोहर्ली तालाब के पिछे जाचं द्वारान साग के कटे पेड को हिरासत मे लिए और मटके मे रखे मोहफुल सडवा को नष्ट किया गया। कहा जाता है की हातभट्टी वालो को पहले ही सूचना मिलने से  मौके पर कोई मिला नही।
सुत्रो के नुसार मोहफुल की शराब निकालाने मे साग और बिजा का इस्तेमाल किया जा रहा है क्योकी वह जलद पेट लेती है और धुआ भी कम करती है। ऐसे मौल्यवान पेड का कत्तल किया जा रहा है फिर भी कोई कारवाई नही होती? क्या बिट निरक्षन मे जंगल कटाई का पता नही चलता ? इन सबको रोखने के लिए वनविभाग ने लगातर कारवाई करनी चाहीए।
ताकी जो बेखौफ  सागौन और बिजा के बडे पेड़ों को काटकर मोहफुल की शराब निकालने पर रोख लगे।
एक तरफ हमारे वनमंत्री सुधीरभाऊ मुनगंटीवार पेड़ लगाने पर लाखों रुपये खर्च कर रहे है।
हाल ही में मोहर्ली वनक्षेत्र में वृक्षारोपण पर 44 लाख खर्च किए गए, फिर भी परिणाम शून्य है। और जो हमारे जंगल मे बडे मौल्यवान पेडो को भी बचाने मे वनविभाग की कमी नजर आ रही है।
लोगों से कहा जाता हैं कि “पेड़ लगाओ, पेड़ बचाओ” और एक तरफ बड़े-बड़े पेड़ों का वध किया जा रहा है। जिस पेड़ को बडा होने में  सालो साल लग जाता हैं मात्र उसे काटने में हातभट्टी वाले सिर्फ़ 5 मिनट लगते हैं, यह बहोत दुख की बात है।
मोहर्ली वन परीक्षेत्र के मोहर्ली व देवाडा मे मोहफुल की शराब निकाली जाती है । और ऐसे बहोत से जंगल के गाव है जहां हातभट्टी से शराब निकाली जाती है।  अभी तो चंद्रपूर जिले की शराब सुरू हुई है। मोहफुल की शराब निकालने के लिए वे वनों की कटाई करते हैं और बाघ क्षेत्र के जंगलों में शराब निकालते हैं, यह बहोत ही गलत बात है।  सिर्फ़ हजारों रुपये मूल्य की शराब के लिए जंगलों को नष्ट किया जा रहा हैं।  चंद्रपुर जिले में शराब बंदी हटने के बाद भी हाथभट्टियों से शराब का उत्पादन मे तेजी नजर आ रही है।
तो शराबबंदी के दौरान कितनी शराब निकाली गई होगी और कितने पेड़ काटे गये होगे इसका कोई अंदाजा नाही है।
जिले में हर जगह आज मानव वन्यजीव संघर्ष बढ़ते नजर आ रहा है। ऐसे वनों की कटाई के कारण भी बाघ भी अपने आवास की तलाश में शहर के करीब आ रहे हैं।
इसी तरह पेड की कटाई जारी रही तो वह दिन दूर नही जब ताडोबा जंगल खुला मैदान हो जाएगा।

“जहां हरियाली वहां खुशहाली”
जंगल है तो बाघ है और दोनों है तो पर्यटन है। ताडोबा में पर्यटन नहीं तो रोजगार नहीं है। और इसका सीधा असर आम इंसान के जीवन पर पड़ता है जंगल नही तो बारिश नहीं होगी, बारिश नहीं तो खेतों में फसल नहीं होगी। फसल नही मंगाई बडेगी। ताडोबा में जंगल नही होगा तो बाघ नही रहेगे पर्यटन मे बाघ नही दिखेगे सैलानीओ का आना कम होगा । धीरे-धीरे पर्यटन बंद हो जाएगा। पर्यटन नहीं होने पर ताडोबा बफर झोन के 89 गांवों के विकास के लिए आवश्यक धनराशि उपलब्ध नहीं होगी। साथ ही ताडोबा में पर्यटन से हजारों परिवार रस्ते पर आ जाएगे।
सिर्फ़ कुछ परिवार हाथभट्टी से शराब निकालकर अपनी आजीविका चला रहे हैं। जबकी हाथभट्टी लगाने व वालो मे कुछ परिवार को ताडोबा पर्यटन से भी रोजगार मिलता है ।
वन प्रशासन ने इस विषय पर गंभीरता से काम करे और साथ ही गांव के स्थानीय लोगों को भी जंगल को बचाने में अपने रोजगार को बचाने मे मदद करनी चाहिए।

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